सुरेन्द्र शर्मा वस्तुतः प्रगतिशील विचारों के लेखक हैं| उनके निबंधों में उनका आतंरिक व्यक्तित्व उभरता है| शर्मा जी लिखते हैं:- आखिर मांसाहारी लोग कब तक शाकाहार के समर्थन में प्रवचन देते रहेंगे? कब तक मांस नोचने वाले गिद्ध दाना चुगने वाले कबूतरों के खिलाफ बयानबाजी करते रहेंगे? राजनिति में इस तरह शर्मा जी ने आमिताभ बच्चन की आलोचना की है, सस्ती लोकप्रियता में फंस जाने के लिए| ईमानदारी का ही गुण होता है कुरूपता, असभ्यता पर आक्रमण करना| किन्तु विक्षोभ का आधार सोंदर्य एवं गुण ग्राहकता ही होता है| सुरेन्द्र शर्मा का वास्तविक रूप बुश और अमिताभ पैर आक्रमण करने में ही नहीं रामनाथ अवस्थी की भाव-तरल स्मृति स्तुति में है|

डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी
(विख्यात कवी एवं आलोचक)
बी5-एफ २,
दिलशाद गार्डन दिल्ली- 110095


सुरेन्द्र शर्मा के मन में वह स्वाभाविक आग है जो राष्ट्र व समाज में अंधाधुंध चल रही अनैतिकता तथा अनाचार की आँधियों का स्पर्श पाकर दहक-दहक उठती, धधक उठती, किंवा भड़क पड़ती है| वह निश्छल, संवेदनशील व पीड़ित जनों के दर्द का सहभोक्ता है| मेरा मानना है कि जैसे धरती पर प्रभात, रात, दोपहर और मौसम कि बहुरंगी छाया पड़ती है और उसकी काय विविध रूपों में प्रतिभासित होती है किन्तु रहती वह धरती ही है| इसी प्रकार कविता अपने वातावरण और परिवेश आदि के अक्स ग्रहण करने के बाद भी कविता ही रहती है| साहित्य के ऐसे इतिहास पर भी सुरेन्द्र शर्मा कि पैनी नज़र पड़ती है और वे अपनी प्रतिक्रिया में वह बहुत कुछ कह जाते हैं जिसे तथाकथित समीक्षक परिभाषाओं की गठरी में बाँधने कि चेष्टा करते हैं|

डॉ. गिरीजाशंकर त्रिवेदी
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